# भारत में भाषाओं का संकटकाल **Published by:** [Vātāyana](https://paragraph.com/@v-t-yana/) **Published on:** 2022-02-17 **URL:** https://paragraph.com/@v-t-yana/FwryATxdQiP3W7LRy3JB ## Content पिछली ब्लॉगपोस्ट में हमने भारतीय संस्कृति की हृदयस्थली-स्थित हिन्दी भाषा के विस्तृत प्रभाव-क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक संवाद को स्निग्ध और सुगम बनाने में हिन्दी की भूमिका पर संक्षेप में विचार किया। किन्तु यह सुगमता इस जटिल वैविध्य वाले भाषाई चित्रपटल पर आसन्न किसी भी संकट का खण्डन तो सर्वथा नहीं है। भीषण संकट केवल है ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण देश में व्याप्त भी है। भारतीय भाषाओं की साहित्यिक सृजनशीलता की सूखती गंगा इस संकट का प्रत्यक्ष प्रमाण है। कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है; तो यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण कदापि नहीं होगा की आज भारतीयों के पास अपनी मातृ-भाषाओं में ऐसा कोई दर्पण है ही नहीं जिसमें वो झाँक कर आत्मावलोकन कर सकें। तब प्रश्न यह उठता है कि ऐसी स्थिति कैसे आई? उत्तर प्रत्यक्ष है। भाषाएँ निष्प्राण नहीं होती बल्कि जीवन्त, सप्राण जीव होती हैं। समाज भाषाओं का शरीर होता है और लोगों द्वारा परस्पर संवाद, विमर्श और विभिन्न विचारों एवम् सिद्धान्तों, संकल्पनाओं आदि की अभिव्यक्ति उनके प्राण होते हैं। जितना अधिक लोग अपनी भाषाओं में स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं, ना केवल दैनन्दिन संवादों में, वरन मानव अभिव्यक्ति के प्रत्येक पक्ष में, उतना ही उनकी भाषाएँ संवर्धित होकर अधिक सम्पूर्ण, परिष्कृत, प्रशस्त एवम् अभिव्यञ्जक होती हैं। उपनिवेशवाद और उसके साथ आई अधिप्रचारयुक्त शिक्षा, जिसका उद्देश्य ही अंग्रेजी मानस वाले सिपॉय और क्लर्क बनाना था, जो केवल दिखने में भारतीय हों, और तत्पश्चात् निकट इतिहास में वैश्वीकरण और प्रौद्योगिकी संचालित संचार क्रान्ति के कारण सभी भारतीय भाषाओं की परिधि तेजी से घटी है। साथ ही स्वतन्त्रता के बाद भी हमारे शासनतन्त्र और समाज द्वारा अंग्रेजी भाषा का औपनिवेशिक बोझा नहीं उतारने और विज्ञान एवम् प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अंग्रेजी का प्रश्नातीत वर्चस्व होने से यह सुनिश्चित हुआ है की ऐसे कोई भी संवाद, जिनकी विषयवस्तु समाज के लिए प्रासंगिक हो, महत्वपूर्ण हो, केवल और केवल अंग्रेजी भाषा में ही हों। अंग्रेजी एक वैश्विक सम्पर्क-भाषा होने के कारण निश्चित रूप से लाभदायी होती है, किन्तु क्या यह सच में इतनी अपरिहार्य है? भारतीय भाषाओं की अंग्रेजी के समक्ष अविवाद्य अधीनता का सिद्धान्त नीति-निर्माताओं, बुद्धिजीवियों और वृहत्तर समाज द्वारा स्वीकार किए जाने के पहले यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए था। परन्तु हमने जुगाड़ लगा कर काम चलाना निश्चित किया और इन प्रश्नों से मुँह मोड़ लिया। परिणामतः आज हमारा समाज अपने भाषाई वैविध्य के संहार की ओर बढ़ रहा है। ऐसा नहीं है की समाज में इस आसन्न संकट को लेकर कोई चेतना ही नहीं है। विभिन्न भाषाई आन्दोलनों की माँगों में, चाहे वे राजनीतिक, सामाजिक-आर्थिक स्वार्थों से कितनी ही प्रेरित क्यों न हों, भारतीय भाषाओं के संरक्षण का भाव तो अन्तरप्रवाहित होता ही है। तथापि, जैसा उपनिवेशवाद से पीड़ित मानस वाले समाजाें में सामान्य है, हम भी समस्या के समाधान पर विमर्श करना तो दूर, अभी तक समस्या का निदान तक नहीं कर पाए हैं। भारत में होने वाले भाषाई आन्दोलनों द्वारा केवल अन्य भारतीय भाषाओं का ही विरोध इसी सच्चाई को प्रतिबिम्बित करता है। जबकि वास्तविकता यह है की प्रत्येक भारतीय भाषा का टकराव अपनी सोदर्या भाषाओं से नहीं है, वरन अंग्रेजी ने उनकी परिधि को अतिक्रमित किया है, फिर चाहे वह विज्ञान एवम् प्रौद्योगिकी का क्षेत्र हो, साहित्यिक सृजनशीलता हो अथवा आर्थिक क्षेत्र हो। आज भारत में समस्त आधुनिक ज्ञान एवम् गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। सभी औपचारिक व्यावसायिक गतिविधियों और संवादों का माध्यम अंग्रेजी है। ऊँट के मुँह में जीरे के समान जो थोड़ा-सा साहित्य सृजन हमारे समाज में हो पा रहा है, उसका माध्यम भी अंग्रेजी ही है। पुरानी पीढ़ियों के प्रयाण के साथ हमारी समृद्ध साहित्य परम्पराएँ धीमी, कष्टप्रद मृत्यु की ओर अग्रसर हैं। भारत की नई फसल अपनी भाषाओं की रसानुभूति के किसी भी सार्थक अनुभव से सर्वथा वञ्चित है क्योंकि हमने अपनी भाषाओं को एक गौण भाषा विषय बनाकर १५०-२०० पन्नों की पाठ्यपुस्तकों में समेट कर रख दिया है; और कोई आश्चर्य की बात नहीं की समय-समय पर इसे भी आवश्यकता से अधिक बताने वाले मिल ही जाते हैं। आज हम इस स्थिति में आ गए हैं की हमें अपनी ही मातृभाषाएँ बोलने में लज्जा आती है। जब हम इन असंख्य भारतीय भाषाओं के साथ एक अनचाहे अतीत के अनचाहे बोझ जैसे व्यवहार करते हैं, तब क्या हम इन्हें ‘अपनी भाषाएँ’ बोलने के अधिकारी भी बचे हैं? भारतीय भाषाओं पर लगे इस ग्रहण के परिणामस्वरूप उनका विकास अवरुद्ध हुआ है और यह इस तथ्य से स्पष्ट परिलक्षित होता है की सामान्यजन की शब्दावली भाषा की सामान्य प्रवीणता के स्तर से भी कम हो गई है। जिस समय हमें इस गतिशील, नित परिवर्तनशील विश्व में उपजती नित नवीन शब्दों की माँग को पूरा कर हमारी भाषाओं को समृद्ध बनाना चाहिए, हम न केवल उनका विकास अवरुद्ध कर रहे हैं, हम अंग्रेजी के लिए अपनी मातृभाषाएँ छोड़ कर उन्हें संकुचित भी कर रहे हैं। जब हम हमारी अपनी भाषाओं में कोई लेखन, पठन-पाठन नहीं करते, कोई संचार सामाग्री नहीं ग्रहण करते, कई बार तो हम अपनी भाषा में विचारते तक नहीं, तब हम यह कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि हमारी भाषाएँ स्वयमेव समसामयिक बन आज के विश्व के लिए उपयुक्त संचार माध्यम बन जाएँगी? यद्यपि यह भारतीय भाषाओं के पक्ष में एकजुट हो अंग्रेजी के विरुद्ध एक आह्वान लग सकता है, परन्तु ऐसा है नहीं। जैसा पहले कहा कि एक वैश्विक सम्पर्क-भाषा होने से अंग्रेजी निश्चित कई लाभ और अवसर देती है। किन्तु ना भूलें कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’। हमें आवश्यकता है आत्मविश्लेषण करने की कि क्या एक अनजान, विदेशी भाषा के असंगत प्रसार की अपनी हानियाँ नहीं हो सकतीं? किन्तु यह भी सत्य है की कोई भी सार्थक आत्मविश्लेषण, आत्मावलोकन विषय के उचित निदान, पहचान के बाद ही संभव है। क्या हमारा समाज रुक कर इन प्रश्नों पर विचार करने के लिए इच्छुक भी है? क्या हम इन प्रश्नों को विचार करने योग्य समझते भी हैं? यदि हम ठहर कर विचार कर भी लें, तो क्या इस संकट को हम अब रोक भी पाएँगें? या कुछ करने का समय पहले ही बीत चुका? इन प्रश्नों के उत्तर तो काल का गर्भ चीर कर ही बाहर आएँगे… प्रणाम। ## Publication Information - [Vātāyana](https://paragraph.com/@v-t-yana/): Publication homepage - [All Posts](https://paragraph.com/@v-t-yana/): More posts from this publication - [RSS Feed](https://api.paragraph.com/blogs/rss/@v-t-yana): Subscribe to updates