# भारतीय लोकतंत्र के राजनैतिक मानस की विकास यात्रा **Published by:** [Vātāyana](https://paragraph.com/@v-t-yana/) **Published on:** 2022-05-22 **URL:** https://paragraph.com/@v-t-yana/V2PIXzG2tClUf3ZoiPPC ## Content 50 और 60 के दशक उन पीढ़ियों के थे जिन्होंने बड़े होते हुए (30-40 के दशक में) कांग्रेस को 'सर्वसमावेशी' टेंट के रूप में देखा-सुना था। गाँधी और कांग्रेस द्वारा विभाजन के समय धोखा मिलने पर भी इस 30-40 के दशक की पीढ़ी पर मिथकीय विषकन्या का सम्मोहन नहीं टूटा था। 70-80 के दशक की युवा पीढ़ियों ने अपने बचपन में (50-60 के दशक में) स्वाधीनता के बाद कांग्रेस की असफलताओं को देखा। उस समय कांग्रेस के कवच में छेद हो रहे थे, किन्तु उसका ढाँचा दृढ़ था क्योंकि संस्थागत एवम् मानसिक (शिक्षा, पत्रकारिता, आदि माध्यमाें से) नियन्त्रण जस का तस था। और राजनैतिक धरातल पर कोई वृहद, विश्वसनीय चुनौती भी नहीं थी। बरसों बाद साँस लेने का समय पा कर राष्ट्रवादी शक्तियाँ अभी एकत्रित ही हो रही थीं। साथ ही, '62 का युद्व, बारम्बार पड़ते अकाल, आदि के रूप में स्वाधीनता के बाद के भारत के जो सपने दिखाए गए थे, वो टूट रहे थे। इन्हीं 50-60 की असंतुष्ट पीढ़ियों ने अपनी युवावस्था में 70-80 के दशक में कांग्रेस-विरोध का झंडा ऊँचा किया। कांग्रेस ने अपनी असफलताओं से उपजी व्यग्रता और विश्वसनीय विपक्ष के उदय को कुचलने की अधीरता में आपातकाल लगाकर कांग्रेस-विरोध का तात्कालिक कारण थाली में सजा कर दिया। किन्तु 50-60 के दशकों में रहे पूर्ण मानसिक नियन्त्रण के कारण अंतर्निहित भ्रम के फलस्वरूप राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ-साथ राष्ट्र-विरोधी शक्तियाँ भी बलशाली हुईं। 70 और 80 के दशक में जन्मी पीढ़ियों ने 90-2000 के दशक में कांग्रेस के राजनैतिक दुर्ग को ढहाया। किस पथ नहीं जाना है, यह तो लोग समझ पा रहे थे, किन्तु अन्य विकल्पों को लेकर वैचारिक स्पष्टता का अभाव अभी था। दुर्ग ढह गया था तथापि टेक लेकर कांग्रेस चल पा रही थी। अर्थात्, बचपन में बोए गए संस्थागत, मानसिक नियन्त्रण के बीज अपना काम अभी भी कर पा रहे थे। राष्ट्रवादी शक्तियों द्वारा इसका प्रतिकार किया जा रहा था, परन्तु उनके प्रयास पर्याप्त नहीं थे। विषकन्या का सम्मोहन क्षीण हो रहा था, फिर भी टूटा नहीं था। प्रतिकार हेतु उपयुक्त साधनों का अभाव था। यही साधनों की उपलब्धता 90-2000 के दशकों में जन्मी पीढ़ियों को पूर्ववर्ती पीढ़ियों से अलग करती है। इन पीढ़ियों को अपनी किशोरावस्था और आरम्भिक युवावस्था में आर्थिक उदारीकरण, उससे हुए मीडिया विस्फोट और इंटरनेट का पूर्णतः लाभ मिला। पहली बार किसी पर सम्मोहन निष्क्रिय हुआ। संप्रग के 10 वर्षों के गड़बड़-घोटाले और रीढ़हीन शासन के साथ-2 भारत विखंडन शक्तियों (भाविश/BIF) व जिहादी शक्तियों ने रहा सहा काम कर दिया। भ्रम-निवारण में इंटरनेट ने राष्ट्रवादी शक्तियों के हाथ बली किये। इससे मतदाताओं में वैचारिक स्पष्टता और दृढ़ता आई। इस पीढ़ी ने परिवर्तन का पहला अवसर आते ही उसे हाथोंहाथ लिया। ध्यान रहे कि '14 के चुनाव में नए मतदाताओं का अदम्य समर्थन राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ था। वहीं अन्य शक्तियों के मतदाता मुख्यतया पूर्ववर्ती पीढ़ियों के होते हैं। जैसे-2 ये पुरानी पीढ़ियां जाएँगी, शत्रु क्षीण होगा। संक्षेप में, 2008-12 के अन्तराल में इंटरनेट (और अनुकूल मीडिया) की पैठ बढ़ने से संस्थागत और मानसिक नियन्त्रण की बेड़ियाँ तोड़ने हेतु राष्ट्रवादियों को उपयुक्त साधन उपलब्ध हुआ। फलस्वरूप 90-2000 की पीढ़ियों को उचित दिशा का भान हुआ और वे राष्ट्र के पक्ष में संगठित हुए। अन्ततः राष्ट्रवादी शक्तियों को विषकन्या के सम्मोहन का निरोध करने वाली और वैचारिक स्पष्टता देने वाली औषधि मिल गई। जैसे-जैसे 2000 की पीढ़ी परिपक्व होगी, इसके प्रभाव 2020 के दशक में भी देखने को मिलते रहेंगे। सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, तो भविष्य के प्रति आशान्वित हुआ जा सकता है। ## Publication Information - [Vātāyana](https://paragraph.com/@v-t-yana/): Publication homepage - [All Posts](https://paragraph.com/@v-t-yana/): More posts from this publication - [RSS Feed](https://api.paragraph.com/blogs/rss/@v-t-yana): Subscribe to updates