प्रचार विभाग मार्च, 2023
सतगुरु देह का नाम नहीं है, सतगुरु होता ज्ञान है (हरदेव वाणी , शब्द - 26)
विषय: निरंकार (ज्ञान) ही गुरु है।
"यह निरंकार (ज्ञान) ही आपका गुरु है, मेरा बुत आपका गुरु नहीं है। मैंने तो इशारा ही देना है।"
- बाबा अवतार सिंह जी
महापुरुषों, जब यह मिशन बाबा बूटा सिंह जी ने शुरू किया तब निरंकार प्रभु की ही भक्ति सिखाई जाती थी। और बाबा अवतार सिंह जी भी केवल निरंकार से ही जोड़ते थे, और अक्सर यह कहते थे कि, "जो भी मांगना है, किसी दो कानों वाले से मत मांगो। निरंकार से मांगो। अगर मुझसे भी आकर कहोगे तो मैं भी निरंकार को ही अरदास करूंगा।"
इस संदर्भ में बाबा अवतार जी के और हमारे पवित्र ग्रंथों के वचन आप जी के चरणों में दोबारा रखे जा रहे हैं। आपजी परवान करना जी।
1️. बाबा अवतार सिंह जी महाराज ने अपने वचनों में जिक्र किया कि "यह निरंकार ही आपका गुरु है, मेरा बुत (शरीर) आपका गुरु नहीं है"।
और आगे फरमाने लगे, "मैं कल दिल्ली से बाहर जा रहा हूं, किसी ने ये नहीं कहना कि बाबा जी चले गए हैं, क्योंकि निरंकार ही आपका बाबा है और यह हर पल आपके अंग संग है। इसीलिए तो कहा गया है...
गुरु मेरे संग सदा है नाले सिमर सिमर तिस सदा संभाले। अर्थात्, गुरु यानि निरंकार प्रभु परमात्मा हमेशा मेरे अंग संग है, हमेशा मेरे साथ है। क्योंकि शरीर (अगर शरीर को गुरु मान लें) तो हमेशा अंग संग हो नहीं सकता, हमेशा अंग संग तो निरंकार गुरु ही हो सकता है।
जब शहंशाह जी से पूछा गया कि "अगर निरंकार ही गुरु है तो फिर आप कौन हैं?" तो बाबा जी ने समझाया, "मेरा काम तो टीटी वाला है। जैसे टीटी ट्रेन की तरफ इशारा कर देता है, आप उसमें बैठ जाते हो और ट्रेन मंजिल पर ले जाती है। इसी तरह मैंने आपको निरंकार का इशारा दे दिया है। अब आपने निरंकार से ही जुड़ना है, और निरंकार ने ही आपको मंजिल पर पहुंचाना है, निरंकार ने ही आपके सारे काम करने हैं। मुक्ति भी आपको मैंने नहीं, निरंकार ने ही देनी है।"
बाबा जी आगे फरमाने लगे, "अगर कोई टीटी को ही पकड़ कर बैठ जाए और ट्रेन में चढ़े ही ना, तो वो कभी मंजिल पर नहीं पहुंच सकता। इसी तरह कोई इशारा देने वाले के पीछे भागता रहे, और निरंकार से ना जुड़े तो उसका पार उतारा नहीं हो सकता। इसलिए आपने भक्ति निरंकार की ही करनी है, सिमरन भी निरंकार का करना है, अरदास भी निरंकार को ही करनी है।"
▪️ बाबा जी ने आगे फरमाया, "शुरू शुरू में इशारा देने वाले की, ज्ञान देने वाले की जरूरत होती है। लेकिन ज्ञान हो जाने के बाद, ये ज्ञान ही आपका गुरु है, निरंकार ही आपका गुरु है। और, इशारा देने वाले में कमी हो सकती है, पर निरंकार गुरु में नहीं क्योंकि यह 'अभुल गुरु करतार' होता है!
फिर महात्माओं ने और प्रश्न किया, कि यदि निरंकार ही गुरु है, तो साकार कौन है? बाबा जी ने समझाया, "वास्तव में ये सारी सृष्टि निरंकार का साकार रूप है। कुछ भूले हुए लोग शरीर को साकार कह देते हैं परंतु यह उनकी भूल है।"
जैसे, धुनि में हम रोज़ पढ़ते हैं, 'तेरा रूप है यह संसार', अर्थात, हे निरंकार प्रभु परमात्मा, यह सृष्टि तेरा साकार रूप है। जब इस ब्रह्मदृष्टि से देखा जाता है तो सारे जीव जंतु, सारी वनस्पति, सारी सृष्टि निरंकार का साकार रूप है, जैसे कहा भी है कि, "सब गोबिंद है, सब गोबिंद है, बिन गोबिंद नाही कोई"। यही अद्वैत की अवस्था है।
इसीलिए कहा है कि सरगुण निरगुण निरंकार सुन्न समाधि आप, आपन किया नानका आपे ही फिर जाप।
अर्थात, निरंकार निर्गुण भी है और सरगुण भी है। जब निरंकार प्रभु परमात्मा को अपने मूल तत्व में देखा जाता है (यानि मूल रूप में) तो यह निर्गुण निराकार है। लेकिन जब ये रूप धारण करता है तो सारी सृष्टि इसका बदला हुआ रूप हो जाती है।
▪️ हालांकि निरंकार ही गुरु है, फिर भी आमतौर पर किसी इन्सान को गुरु क्यों कहते हैं?
"अवस्था के कारण!" बाबा जी ने कहा, "जब किसी ब्रह्मज्ञानी संत की अवस्था निरंकार जैसी हो जाती है, भाव उसमें निरंकार के गुण आ जाते हैं, जैसे अनासक्त, निष्कपट, निष्काम, एकरस आदि, तो उसे गुरु कह देते हैं।" बाबा जी ने आगे कहा, "इसी अवस्था के आने को ही कहा जाता है कि 'इनमें जोत आ गई है', 'शक्ति आ गई है' इत्यादि।"
कोई भी ब्रह्मज्ञानी संत इस अवस्था को प्राप्त कर सकता है लेकिन फिर भी उसकी अवस्था में उतार चढ़ाव आ सकते हैं, पर निरंकार में नहीं। इसलिए गुरसिख ये जानता है कि वास्तव में निरंकार (ज्ञान) ही पूर्ण गुरु है। इसलिए बाबा अवतार सिंह जी के समय पर मंगलाचरण की पहली पंक्ति में ही निरंकार को पूर्ण सतगुरु कहकर संबोधन किया जाता था: आदि मध्य ते अंत तक कायम हे निरंकार तैनु पूर्ण सतगुरु, प्रणाम करे अवतार।
बाबा गुरबचन सिंह जी ने भी यही समझाया, कि "लोग भुलावे में आ जाते हैं, और शरीरों से, ग्रंथों से जुड़ जाते हैं इसलिए निरंकार का सिमरन दिया गया है क्योंकि निरंकार ही हमारा सच्चा गुरु है।" और आगे कहा कि जब यह कहा जाता है कि "गुरु पर विश्वास जरूरी है" तो इसका भाव कि "निरंकार पर विश्वास जरूरी है, यही सर्वशक्तिमान है, यही रचयिता है।"
लेकिन, जैसे-जैसे मिशन में परिवारवाद हावी हुआ और आध्यात्मिकता में गिरावट आती चली गई, निरंकार को छोड़कर शरीर पर ही केंद्रित होते चले गए।
बाबा अवतार सिंह जी ने यह भी कहा था कि जिसने हमें इशारा दिया यानि ज्ञान दिया, यह उसकी कृपा है, हमें उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखना है, लेकिन जुड़ना इसी निरंकार से है जिसका ज्ञान दिया गया है।
इसी तरह बाबा जी ने समझाया कि जब कोई हमें पानी पिलाता है, "हालांकि, धन्यवाद तो पानी पिलाने वाले का किया जाता है, लेकिन प्यास तो पानी ने ही बुझानी होती है। इसी तरह निरंकार को बताने वाले का धन्यवाद तो करना होता है, लेकिन आत्मा की प्यास तो निरंकार से ही बुझनी है, ..." भाव कि, मुक्ति तो निरंकार ने ही देनी है, इसलिए गुरसिख निरंकार का ही सिमरण करता है, निरंकार को ही मन में बसाता है।
3️. कहने का भाव यह है कि एक निरंकार है, और एक निरंकार का इशारा देने वाला। ये ऐसा ही है जैसे चांद, और चांद का इशारा देने वाला। चेतन महात्मा इशारा करने वाले का धन्यवाद करते हैं, और चांद को ही चांद समझते हैं, इशारा करने वाले को चांद नहीं समझते। क्योंकि चांद की तरफ इशारा करने से कोई चांद का मालिक नहीं हो जाता, ना ही चांद हो सकता है। ☑️
और, इशारा करने वाले में तो कमी हो सकती है लेकिन निरंकार में नहीं। आदिकाल से, जब भी निरंकार से ज्यादा महत्व निरंकार का इशारा देने वाले को दिया गया, आध्यात्मिकता का पतन हुआ है। और जब इशारा देने वाला पथभ्रष्ट हुआ तो भी उस आध्यात्मिक धारा का पतन हुआ है। इतिहास बताता है, इशारा देने वाले और उनसे जुड़ी संस्थाएं बदलती रहती हैं जबकि निरंकार-गुरु सदा रहता है। इसलिए पूजा सिर्फ निरंकार की, वंदना सिर्फ निरंकार की, विश्वास सिर्फ निरंकार के ऊपर, सिमरन सिर्फ निरंकार का, भक्ति सिर्फ निरंकार की, जैसे शहंशाह जी ने कहा "यारो रब दी भक्ति कर लो।
जब कोई ब्रह्मज्ञानी संत, इस निरंकार को जानकर, निरंकार के गुणों को अपनाकर, इससे इकमिक हो जाता है, यानि निरंकार गुरु का ही रूप हो जाता है, तो उसको भी गुरु कह दिया जाता है। अर्थात गुरु एक अवस्था है - निरंकार जैसी अवस्था। और इस अवस्था में पहुंचा हुआ संत कभी भी भ्रष्टाचार और परिवारवाद को नहीं अपनाएगा।☑️
4️. जैसे, हरदेव वाणी में भी दर्ज़ है कि,
सतगुरु देह का नाम नहीं है, सतगुरु होता ज्ञान है, सतगुरु को देह समझना भूल है अज्ञान है। (शब्द - 26)
अर्थात, शरीर गुरु नहीं है, ज्ञान ही गुरु है। जैसे भगवान कृष्ण ने भी गोपियों को यही संदेश दिया कि "मोक्ष का प्रदाता ये निराकार ब्रह्म ही है, इसलिए मेरे शरीर के मोह में न पड़कर, आप इस निराकार विराट स्वरूप से जुड़ें।"
5️. अवतार वाणी में फिर कहा गया है कि...
शब्द गुरु ते सुरत है चेला, भेद इह कोई पछाने ना, कहे अवतार बिना गुर पूरे, एह रमजां कोई जाने ना।
अर्थात, परमात्मा गुरु है और आत्मा गुरसिख है, और यह बात निरंकार रूपी पूर्ण गुरु (क्योंकि निरंकार के सिवाय कोई भी पूर्ण नहीं है) की कृपा से ही समझ में आती है। आगे भी कहा है कि...
निरंकार गुरु दा हुकम है मैंनू भूले नू समझाने दा, निरंकार गुरु दा हुकम है मैंनू अख तों पर्दा लाहने दा।
कि मुझे निरंकार गुरु का हुकम है। बड़ी आसानी से यह भी कह सकते थे कि मुझे बाबा बूटा सिंह जी का हुक्म है, लेकिन गुरसिखों को शरीर के भ्रम बचाकर, बहुत बड़ी बख्शिश की, जब यह कहा कि निरंकार गुरु का मुझे यह हुक्म है। आगे और भी बक्शिश की, कि
"अवतार गुरु एह मरे ना जन्मे, युग युग इको वेश सदा।"
कि गुरु का ना जन्म होता है, ना मरण होता है, इसका युगों युगों से एक ही रूप है, यानि कि निराकार रूप...।
6️. पवित्र गुरबाणी में भी जिक्र आता है,
"आदि अंत एको अवतारा, सोई गुरु समझिओ हमारा।"
अर्थात, जो आदि काल से लेकर अंत तक मौजूद है, वही गुरु है, यानि कि निरंकार प्रभु परमात्मा की तरफ इशारा कर रहे हैं। जो आदि सच है, जुगादि सच है, यही गुरु है।
पवित्र गुरबाणी में और भी जिक्र आता है..., "सतगुरु मेरा सदा सदा, ना आए ना जाए, एह अविनाशी पुरुष है, सब मे रिहा समाये।"
अर्थात्, जो सतगुरु है, वह सदा सदा है, वह हमेशा रहने वाला है, वह आने जाने वाला नहीं है। यह इशारा निरंकार प्रभु परमात्मा की तरफ़ ही है, और कह रहे हैं कि यही हमारा गुरु है।
'गुरु गीता' में भी जिक्र आता है कि, गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर: गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।
अर्थात, निरंकार ही सृष्टि की रचना करने वाला है यानि ब्रम्हा है, निरंकार ही सृष्टि का पालन पोषण करने वाला है यानि विष्णु है, और निरंकार ही सृष्टि का संहार करने वाला है यानि शिव भी यही है।
इसलिए महापुरुष निरंकार गुरु को अंग-संग जानते हुए हर पल इसी का ही सहारा लेते हैं और अपनी हर अरदास निरंकार गुरु के आगे ही करते हैं।
🙏विनम्र निवेदन:🙏 महापुरुषों, जब यह मिशन बाबा बूटा सिंह जी ने शुरू किया तो निरंकार प्रभु ही भक्ति का केंद्र बिंदु हुआ करता था। पुरातन गीत भी इसी सच्चाई पर खड़े होते थे जैसे,
है ज्ञान गुरु दा गुर हुंदा, तन दा ते केवल ओहला ए ना तन नू सतगुर कहदे ने, ना ही तन चेला हुंदा ए।
दुर्भाग्यवश, जब मिशन पर परिवारवाद (वंशवाद) हावी हुआ तो निरंकार को भुला कर, शरीरों से जोड़ने के प्रयास होने लगे, जैसे जन्मदिन मनाना, गुरुवंदना मनाना, गुरुपूजा दिवस शुरू कर लेना आदि। इन परंपराओं से मिशन को शरीर की तरफ मोड़ दिया गया।
▪️ जहां केवल निरंकार का जयघोष होता था, वहां शरीरों के जैकारे लगने लगे। और वह भी पूरे परिवार के, एक एक का नाम लेकर, जैसे कहीं कोई छूट ना जाए। बाबा बूटा सिंह जी और बाबा काहन सिंह जी का नाम छोड़ दिया गया, क्योंकि वो इनके परिवार से नहीं थे। शर्मनाक है!
▪️ जो अरदास निरंकार को हुआ करती थी, वह शरीरों को होने लगी। जहां निरंकार के दर्शन होने थे, वहां शरीर के दर्शनों की भागदौड़ लग गई। अज्ञानता यहां तक बढ़ गई कि कोठी के भी दर्शन होने लगे। धिक्कार है!
▪️ जिस कृपा का स्रोत निरंकार प्रभु को माना जाता था, वह इस परिवार को माने जाना लगा। अगर इस परिवार की कृपा से कुछ होना होता तो बाबा जी और अवनीत जी का एक्सीडेंट ना होता, इन तीनों बहनों का तलाक ना होता, माता सविंदर जी को कैंसर ना होता! सच यह है कि इनकी कृपा से कुछ नहीं होता है। जो भी होता है निरंकार की कृपा से होता है।
इसलिए शहंशाह जी बार-बार दोहराते थे कि, "मैं आप से कहता हूं कि सिर्फ निरंकार से जुड़ो।"
संतो, आइए लौट चलें अपने स्रोत की तरफ। निरंकार की तरफ। और इस परिवारवाद के चंगुल से बाहर निकल कर निरंकार की ही भक्ति करें, निरंकार को ही अरदास करें, निरंकार की ही पूजा-वंदना करें, निरंकार का ही जयघोष करें।
जो बोले तिस बलिहार, "धन निरंकार!"
🙏🙏

