
कबीरदास जी का एक निर्गुण पद है ‘हिरना’। कुमार गन्धर्व जी द्वारा इस पद का गायन मैं प्रायः सुनता हूँ। जब पहले-पहल यह पद सुना था, तो अर्थ जानने के लिए विभीन्न स्त्रोतों पर खोजा था। परिणामस्वरूप जो व्याख्या मिली, वह और मूल पद कुछ इस प्रकार हैं:-
मूल पद –
हिरना समझ बूझ बन चरनाएक बन चरनादूजे बन चरनातीजे बन पग नहि धरनातीजे बन में पाँच पारधिउनके नजर नहि पड़नापाँच हिरना, पच्चीस हिरनीउनमे एक चतुरनातोहे मार तेरो माँस बिकावेतेरे खाल का करेंगे बिछोनाकहे कबीरा जी सुनो भई साधोगुरु के चरन चित धरना
– सन्त कबीरदास जी
भिन्न-भिन्न जालकेन्द्रीय (वेबसाइट-बेस्ड) स्त्रोतों से प्राप्त व्याख्याओं का सार (मेरे अपने शब्दों में, अपनी शैली में व्यक्त कर रहा हूँ।) –
हे हिरण! समझ बूझ कर चरनापहले*[१] वन में चरना, दूसरे*[२] वन में चरना(किन्तु) तीसरे*[३] वन में पग भी मत रखना, हे हिरण।
तीसरे वन में पाँच*[४] पारधी (शिकारी) हैंउनके नजर में कभी मत आना।
पाँच*[५] हिरण, पच्चीस*[६] हिरणियाँ हैं;उनमें से एक अति चतुर*[७] है।
(शिकारी) तुझे मार कर तेरा माँस बेच देंगे(और) तेरी खाल को बिछौने जैसा उपयोग करेंगे।
कबीर जो कहते हैं, उसे सुनो, हे साधु,(अपने) गुरू के चरणों में चित्त धर (समर्पित कर/रख) दो।
सन्दर्भ :
[१] ‘पहले वन’ से आशय स्पिरिच्युअल रिल्म अथवा आध्यात्म दिया गया है।[२] ‘दूसरे वन’ से आशय विज़डम अर्थात् बुद्धि दिया गया है।[३] ‘तीसरे वन’ से आशय फिज़िकल रिल्म अर्थात् भौतिक लोक दिया गया है।[४] ‘पाँच पारधि’ से आशय पञ्चेन्द्रियों से है, ऐसा बताया गया है।[५] ‘पाँच हिरण’ से आशय भी पञ्चेन्द्रियों से है, ऐसा कहा गया है।[६] ‘पाँच हिरणियों’ का अर्थ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ गुणा पाँच कर्मेन्द्रियाँ बराबर पच्चीस, ऐसा समझाया है।[७] इस पर कहीं कोई टिप्पणी नहीं की गई है।
अन्तरजाल (इंटरनेट) पर खोज करने पर मुझे इस पद की जो उपरोक्त व्याख्या मिली, उससे सन्तुष्टि नहीं हुई। ऐसा इसलिए क्योंकि बिना गहन सन्धान किये, अधिक कुरेदे बिना, ऊपरी तौर पर तो ये प्रचलित व्याख्या ठीक जान पड़ती है; परन्तु कई प्रश्न अनुत्तरित ही रहते हैं। जैसे पाँच गुणा पाँच बराबर पच्चीस, ऐसी गणना से पाँच पारधियों को पच्चीस हिरणियों से सम्बन्धित बता देना किन्तु उसका निहितार्थ स्पष्ट नहीं करना। उदाहरणार्थ, पाँच गुणा पाँच ही क्यों किया, पाँच गुणा दस क्यों नहीं? पाँच पारधी (पञ्चेन्द्रियाँ) पाँच हिरणियों (पुनः पञ्चेन्द्रियाँ) अर्थात स्वयं का ही आखेट क्यों और कैसे करेंगी? गुणा करने के परिणामस्वरूप मिली पच्चीस संज्ञाएँ क्या हैं? पच्चीस में से एक हिरणी जो चतुर है, वो कौन है? और क्यों उसे चतुर कहा? ऐसे मूलभूत प्रश्नों पर सभी स्त्रोत उत्तरहीन मिले। इन सभी प्रश्नों के अनुत्तरित रह जाने से पाठक अधर में लटका रह जाता है। अथवा यह कहूँ कि मैं अधर में लटका रह गया था।
अतः अपने प्रश्नों का उत्तर स्वयमेव ढूँढ निकालने हेतु मैंने भारतीय दर्शनशास्र के अपने सीमित ज्ञान के आधार पर और आगे खोजना आरम्भ किया। जो मिला, उससे कुछ-कुछ स्पष्टता तो मिलती ही है; साथ ही अपनी संस्कृति और अपने ही आध्यात्म-दर्शन आदि परम्पराओं से जो हमारा अलगाव हो गया है, वो भी प्रत्यक्ष होता है।
NPTEL का अपने जालकेन्द्र पर भारतीय दर्शनशास्र पर एक निःशुल्क परिचयात्मक पाठ्यक्रम है, जो मैंने अपने महाविद्यालयीन काल में देखा था। उसी कारण सांख्य दर्शनानुसार वर्णित चौबीस तत्त्वों से मैं परिचित था। पच्चीस (पद की पच्चीस हिरणियाँ) और चौबीस में एक ही संख्या का अन्तर है और सांख्य की ही पुरुष की संकल्पना मिला लेने पर यह पच्चीस हो जाता है। अतः मैंने इसी बिन्दु से आगे खोजना आरम्भ किया। खोजने पर मुझे शैव (विशेषतः कश्मीर शैव परम्परा) और तन्त्र दर्शन में उल्लिखित छत्तीस तत्त्व ज्ञात हुए। समय लगा, किन्तु जो पाया, वह कबीरदास जी की प्रचलित छवि के एकदम परे कुछ तथ्य सामने लाता है।
प्रथमतया हम अर्थ पर विमर्श कर लेते हैं, तत्पश्चात् कबीरदास जी की जो छवि सामने आती है, उस पर संक्षिप्त विमर्श करेंगे।

तन्त्र दर्शन में सृष्टि का लौकिक मानचित्र

कश्मीर शैव दर्शन में ३६ तत्त्वों का वर्गीकरण
ऊपर दिये गए दोनों चित्रों में क्रमानुसार ३६ तत्त्व दर्शाएँ गए हैं। हम नीचे से ऊपर की ओर बढ़ेंगे। सबसे पहले पाँच भौतिक तत्त्व आते हैं जिनसे सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि बनती है। ये पञ्च-महाभूत हैं – पृथ्वी, जल (आपः), अग्नि (तेजस्), वायु और आकाश। हर महाभूत से हमारे सृष्टि को अनुभव करने और उससे परस्पर व्यवहार करने का एक आयाम निकलता है। पञ्च-महाभूतों के ये सूक्ष्म रूप पञ्च-तन्मात्र कहलाते हैं। पृथ्वी से गन्ध, जल से रस, अग्नि से रूप, वायु से स्पर्श तथा आकाश से शब्द तन्मात्र का आविर्भाव होता है। ये पञ्च-तन्मात्र पञ्च-महाभूतों के संवेदन एवम् अनुभूति में रत होते हैं। पृथ्वी-तत्त्व की अनुभूति में पाँचों तन्मात्र, जल-तत्त्व की अनुभूति में चार तन्मात्र (रस, रूप, स्पर्श एवम् शब्द), अग्नि-तत्त्व की अनुभूति में तीन तन्मात्र ( रूप, स्पर्श एवम् शब्द), वायु-तत्त्व की अनुभूति में दो तन्मात्र ( स्पर्श एवम् शब्द) तथा आकाश-तत्त्व की अनुभूति में एक – शब्द – तन्मात्र लगे होते हैं।
तत्पश्चात्, पञ्च-कर्मेन्द्रियाँ यथा – पायु, उपस्थ, पाद, पाणि और वाक् – आती हैं। फिर पञ्च-तन्मात्र अर्थात् पञ्च-महाभूत की अनुभूति का साधन पञ्च-ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हर ज्ञानेन्द्री एक तन्मात्र से सम्बद्ध है। गन्धानुभूति हेतु घ्राणेन्द्री (नाक), रसानुभूति हेतु रसनेन्द्री (जिह्वा), रूपानुभूति हेतु चक्षुष् अथवा दर्शनेन्द्री (आँख), स्पर्शानुभूति हेतु त्वक् (त्वचा) तथा शब्दानुभूति हेतु श्रवणेन्द्री अथवा श्रोत्र (कान) सदा लगी होती हैं।
उपरोक्त पाँच-पाँच तत्त्वों के चार समूह, कुल बीस तत्त्व, सोलहवें तत्त्व (हम छत्तीसवें तत्त्व से पहले को ओर जा रहे हैं) मनस् के अंश हैं। इनमें पञ्च-ज्ञानेन्द्रियाँ मनस् का सात्विक भाव अपने में समाए हुए हैं, पञ्च-कर्मेन्द्रियाँ राजसिक भाव और पञ्च-तन्मात्र तामसिक भाव। मनस् और उसके पहले के दो तत्त्व – अहंकार और बुद्धि – ये तीन मिल कर अन्तःकरण कहलाते हैं। फिर आता है प्रकृति तत्त्व। इस प्रकार ये कुल चौबीस तत्त्व शैव और तन्त्र दर्शनों में अशुद्ध तत्त्व कहलाते हैं।
प्रकृति तत्त्व, बारहवें तत्त्व – पुरुष – के साथ तादात्म्य बना कर ही इस जीव जगत की सृष्टि करता है। प्रकृति के त्रिगुणों से पुरुष के सम्पर्क में आने पर ही अन्तःकरण के तीन घटक तत्त्वों का प्रादुर्भव होता है। सांख्य दर्शन इन्हीं चौबीस तत्त्वों और पुरुष से सम्पूर्ण सृष्टि के लौकिक मानचित्र की व्याख्या करता है। आज का सर्वाधिक प्रचलित हिन्दू दर्शन अद्वैत वेदान्त भी यहाँ आकर ही रुकता है।
किन्तु शैव और तन्त्र दर्शनों में तो अभी ग्यारह और तत्त्वों की व्याख्या है। बारहवें तत्त्व पुरुष से लेकर छठे तत्त्व तक के सात तत्त्व शुद्धाशुद्ध (= शुद्ध + अशुद्ध) तत्त्व कहलाते हैं। शैव दर्शन के ये सात शुद्धाशुद्ध तत्त्व और चौबीस अशुद्ध तत्त्व मिल कर इकत्तीस आत्म तत्त्व होते हैं। इन इकत्तीस में सबसे पहला और छत्तीस में छठे स्थान पर माया तत्त्व है जो अपने पञ्च-कञ्चुकों (सातवें से ले कर ग्यारहवें तत्त्व तक) के आवरण से पुरुष-प्रकृति को इहलोक के भ्रमजाल में बाँधे रखता है। माया के ये पाँच कञ्चुक हैं – कला, विद्या, राग, काल एवम् नियति। यह माया ही है जो पञ्च-कञ्चुकों द्वारा इदम् और अहम् का भेद कर क्रमशः प्रकृति और पुरुष तत्त्वों का पृथक्करण करती है। यही कारण है कि “सर्वम् खल्विदम् ब्रह्म” की अनुभूति जीव के लिए अबोधगम्य रहती है।
माया के प्रस्फुटन के पहले के तीन तत्त्व – सदाशिव-तत्त्व, ईश्वर-तत्त्व और शुद्ध-विद्या-तत्त्व – ये तीनों मिल कर विद्या तत्त्व कहलाते हैं। ये तीनों इदम् और अहम् के एकत्व के तीन भिन्न-भिन्न आयामों का परामर्श देते हैं।
विद्या तत्त्वों से ऊपर शिव और शक्ति – ये दो एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित सर्वोच्च तत्त्व हैं। अपने सुप्रसिद्ध पद ‘सुनता है गुरू ज्ञानी’ में सन्त कबीर जब कहते हैं “नाद बिन्दु से पीछे जमया पानी” तब वे इन्हीं शिव-तत्त्व (नाद-तत्त्व) और शक्ति-तत्त्व (बिन्दु-तत्त्व) का ही उल्लेख कर रहे होते हैं। आपस में तादात्म्य बना ये दोनों ही समस्त सृष्टि एवम् जीव का सर्ग (सृजन), स्थिति (पालन), ध्वंस (संहार), तिरोभाव और अनुग्रह करते हैं। इन्हीं दोनों को मिला शिव तत्त्व भी कहते हैं। प्रश्न उठता है कि यदि ये दोनों भी शिव पुराण-वर्णित इन पञ्च-कृत्यों के साधन-मात्र हैं, तो कर्ता कौन है? कर्ता तो सभी छत्तीस तत्त्वों से परे, स्वयं अतत्त्व, परमशिव है।
अहम् – इदम् के भेद से रहित होने के कारण तीन विद्या तत्त्व और दो शिव तत्त्व (शिव-शक्ति) मिल कर पाँच शुद्ध तत्त्व भी कहलाते हैं।
छत्तीस तत्त्वों के इस गूढ़ ज्ञान में परिचय की यह उथली डुबकी लगा अब हम पुनः सन्त कबीरदास जी के पद की ओर आते हैं। जब मैंने छत्तीस तत्त्वों का यह पूरा वर्गीकरण जाना, तब पद की बहुत-सी अस्पष्ट पंक्तियों का मुझे कुछ-कुछ बोध होने लगा। संक्षेप में जो मेरी समझ बनी, वह कुछ इस प्रकार है:
पहले दो शुद्ध तत्वों अर्थात् शिव तत्त्वों – यथा शिव-तत्त्व एवम् शक्ति-तत्त्व – को ‘पहला वन’ ऐसी उपमा दी गई है।
शेष ३ शुद्ध तत्वों अर्थात् विद्या तत्त्वों – यथा सदाशिव, ईश्वर तथा शुद्ध-विद्या-तत्त्व – को इकट्ठे ‘दूसरा वन’, ऐसी उपमा दी गई है।
तत्पश्चात्, शुद्धाशुद्ध तत्वों तथा अशुद्ध तत्वों, अर्थात माया एवम् उसके अन्तर्गत आने वाले पञ्च-कञ्चुकों, पुरुष-तत्त्व तथा २४ अशुद्ध तत्वों की बात की है। इस प्रकार इकत्तीस आत्म तत्त्वों को ‘तीसरे वन’ की उपमा दी गई है।
पञ्च-कञ्चुक तीसरे वन (आत्म तत्त्वों) के पाँच पारधी हैं जो अपना भ्रम-जाल अथवा माया-जाल डाल कर आखेट करते हैं।
२४ अशुद्ध तत्त्व जिनमें पञ्च-महाभूत, पञ्च-तन्मात्र, पञ्च-कर्मेन्द्रियाँ, एवं पञ्च-ज्ञानेन्द्रियाँ समेत अन्तःकरण (मनस्-तत्त्व, अहंकार-तत्त्व, बुद्धि-तत्त्व) और प्रकृति-तत्त्व के साथ एक शुद्धाशुद्ध पुरुष-तत्त्व; ऐसे कुल पच्चीस तत्त्वों को पच्चीस हिरणियों की उपमा दी है।
२५ हिरणियों में से जिस एक हिरणी को चतुर कहा गया है, वह प्रत्यक्षतया, बुद्धि-तत्त्व ही होगा, ऐसा मेरा मत है।
अभी भी मेरे कुछ प्रश्न हैं जो हल नहीं हुए हैं। और मैं उनके सन्धान हेतु प्रयासरत हूँ। किन्तु इतना मैं अवश्य सन्तोष कर सकता हूँ की पहले की तुलना में इस पद के विषय में मेरी समझ का विस्तार अवश्य हुआ है।
उपरोक्त व्याख्या को देख यह निष्कर्ष निकालना त्रुटिपूर्ण नहीं होगा कि कबीरदास जी ने इस बारह पंक्तियों के साधारण दृष्टिगोचर होने वाले पद में, शैव तथा तन्त्र दर्शन के गूढ़ ज्ञान को बड़ी ही सुन्दरता से पिरोया है। विचारिए, कि जनसामान्य की ग्राम्य भाषा में एक महापुरुष ने हिन्दू दर्शन परम्परा के गहनतम तथापि मूलभूत सिद्धान्तों को सामान्य मानवी के लाभार्थ उपलब्ध करा दिया। यही नहीं, यह पद हिन्दू दर्शन एवम् ज्ञान परम्पराओं के व्यापक प्रचार-प्रसार का भी परिचायक है। इस पद से हमारे समक्ष सन्त कबीरदास जी की जो छवि बनती है, वह उन्हें भारतीय दर्शन परम्परा के महान मनीषी अध्येताओं की पंक्ति में ला खड़ा करती है, वह भी उनकी सहज सर्वसुलभता बनाए रखते हुए। यही कबीरदास जी की विलक्षणता एवं भारतीय संस्कृति में उनकी महत्ता है।
किन्तु एक समसामयिक प्रश्न जो इस पूरे अनुभव से मेरे मन में उपजा, वह यह था की अन्ततः ऐसी स्थिति आई ही क्यों कि एक स्पष्ट व्याख्या के अभाव में मुझे स्वयं अन्तरजाल की खाक छाननी पड़ी? सन्त कबीरदास भक्ति काव्य के सर्वाधिक प्रचलित सन्त हैं। विशेषतः शैक्षिक मण्डलियों में तो सन्त कबीर के कई प्रशंसक, पाठक, अध्येता, अनुयायी आदि हैं। कबीरपन्थी समुदाय सांस्कृतिक-सामाजिक परिक्षेत्र में प्रभावशाली एवम् सक्रिय उपस्थिति रखता है। तथापि कबीरदास जी के पद की उपयुक्त व्याख्या का अभाव, और न केवल अभाव, वरन् त्रुटिपूर्ण अथवा अस्पष्ट समझ का प्रसार! यह कोई शुभ संकेत तो नहीं है।
परन्तु जब धैर्यपूर्वक विचार करता हूँ, तो फिर यह सब मुझे बड़ा ही सामान्य एवम् अवश्यम्भावी जान पड़ता है। जिस प्रकार हिन्दी साहित्य में भक्ति काव्य को सगुण और निर्गुण धाराओं में बाँट कर दोनों को एक प्रकार से एक दूसरे का धुर-विरोधी बताया जाता है; वह हास्यास्पद है। निर्गुण भक्ति काव्य रूढ़ी-विरोधी अवश्य है, किन्तु कहीं भी वह समाज के किसी भी अंग का अन्धविरोधी नहीं बनता। निर्गुण ईश्वर की भक्ति भी उतने ही विश्वास से की गई है जितनी की सगुण भक्ति। कहने का तात्पर्य है कि सन्त कबीरदास निर्गुण राम का बखान करते हैं, किन्तु सगुण का विरोध नहीं।
शैक्षिक मण्डलियों में सन्त कबीरदास के रहस्यवाद पर बहुत शोध, वाद-संवाद हुए, लेख और ग्रन्थ लिखे गए, किन्तु कहीं भी उनके इस निर्गुण निराकार ब्रह्म की संकल्पना की उत्पत्ति पर विचार किया गया हो, ऐसा दिखाई नहीं देता। ऐसा जान पड़ता है मानो यह विचार रखने वाले सन्त कबीर पहले व्यक्ति थे अथवा वे अपने आस-पास के सभी दार्शनिकों, विचारकों से कटे-छँटे थे। निर्गुण भक्ति काव्य धारा के उद्गम और उसके प्रेरणास्त्रोत की यह अवहेलना जान-बूझ कर की गई जान पड़ती है। क्योंकि यदि यह उपेक्षा नहीं की गई, तो भक्ति काव्य की दोनों धाराएँ एक ही में मिल जाएँगी क्योंकि दोनों का स्त्रोत अन्ततोगत्वा हिन्दू दर्शन ही है, यह तथ्य स्थापित हो जाएगा। तब सगुण-निर्गुण भक्ति धाराओं का यह कृत्रिम विरोधाभास भी समाप्त हो जाएगा। भारतीय समाज को बाँटने-लड़ाने का एक साधन खो जाएगा।
स्पष्टतः यह विकृति एक विशेष दृष्टिकोण एवम् विचारधारा को प्रश्रय देने हेतु रची गई है। आज समय की माँग है की हमारी साहित्य परम्पराओं को ऐसी विकृतियों से मुक्त करने के विश्वसनीय प्रयास हों, बिना वैचारिक प्रदूषण लाए, उपयुक्त सन्दर्भ और परिप्रेक्ष्य में हम अपने साहित्य की ज्ञान परम्पराओं को देखें, पढ़ें और समझें। क्योंकि ऐसा न करना ना केवल कपटपूर्ण होगा, वरन् हमारे लिए अपने साहित्य को ठीक प्रकार से समझने और उससे लाभान्वित होने में भी बड़ा बाधक होगा।
यह विकृत एवम् संकुचित दृष्टि से देखे जाने का ही दुष्परिणाम था की जब मैंने इस सारगर्भित पद का अर्थ ढूँढना चाहा, तो मुझे वह कहीं नहीं मिला। अतः हमारी ज्ञान परम्पराओं को समझने हेतु व्यापक एवम् निष्ठावान दृष्टि रखना अत्यावश्यक है। न केवल उचित समझ विकसित करने हेतु, वरन् इसलिए भी कि यही हमारी संस्कृति के पुनरुत्थान और उसकी निरन्तरता सुनिश्चित करने का भी सर्वाधिक सहज-सुलभ साधन है।
पुनश्च – अपनी सीमित समझ एवम् दृष्टि के कारण सम्भव है कि मेरे द्वारा समझे गए पद के अर्थ में अथवा उसे बताने में कोई त्रुटि हो गई हो। यदि कहीं ऐसी कोई त्रुटि पाठक के ध्यान में आए, तो टिप्पणी कर मुझे अवश्य बताएँ। साथ ही, आप इस व्याख्या पर क्या विचारते हैं, यह भी बताएँ।
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