बाँधो न नाव इस ठाँव, बन्धु!
Vātāyana
Jun 3
बाँधो न नाव इस ठाँव, बन्धु! पूछेगा सारा गाँव, बन्धु! यह घाट वही जिस पर हँसकर, वह कभी नहाती थी धँसकर, आँखें रह जाती थीं फँसकर, कँपते थे दोनों पाँव बन्धु! वह हँसी बहुत कुछ कहती थी, फिर भी अपने में रहती थी, सबकी सुनती थी, सहती थी, देती थी सबके दाँव, बन्धु! – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’एकांगी प्रेम के ठाँव की ओर जब कभी भी प्रारब्ध का खेवैया हमारे जीवन की नाव ले जाता है, मन की सदैव यही विनती होती है, “बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!”। यदि किसी समय फँसने वाली आँखों, धँसने वाले पैरों, निकलने वाली साँसों...
ParagraphParagraph

Vātāyana

Written by
Vātāyana
Subscribe

2025 Paragraph Technologies Inc

PopularTrendingPrivacyTermsHome
Search...Ctrl+K

Vātāyana

Subscribe